सरदार वल्लभ भाई पटेल जीवनी

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सरदार वल्लभ भाई पटेल की इस जीवनी में उनके जीवन के विशेष पहलू की बात करेंगे जैसे उनके द्वारा किये गए आंदोलन (खेडा  आंदोलन, बारडोली सत्याग्रह), उन्हें सरदार की उपाधि कैसे मिली,उनका भारत की स्वतंत्रता में योगदान, देशी रियासतों के एकीकरण में उनका योगदान, उनके जन्म मृत्यु, उनके परिवार (माता,पिता,पत्नी,तथा भाइयो) तथा उन पर लिखी किताबे अंत में हम स्टेचुए ऑफ़ यूनिटी की बात करेंगे। सरदार वल्लभ भाई पटेल के विचार, द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ सरदार वल्लभ भाई पटेल

महान स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाम प्रथम स्थान पर लिया जाता है उन्होंने अपना योगदान भारत की स्वतंत्रता में तो दिया ही साथ ही स्वतंत्रता के बाद भी उनका योगदान अवस्मरणीय है क्यों की उन्होंने भारत के कई टुकड़े होने से देश को बचाया उन्होंने ने 562 से ज्यादा छोटी बड़ी रियासत का एकीकरण कर उन्होंने अखंड भारत का निर्माण किया । भारत की राजनीती में भी वे सक्रियता से सम्मलित थे वे भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री (15 अगस्त 1947 – 15 दिसम्बर 1950) के साथ साथ प्रथम गृह मंत्री (15 अगस्त 1947 – 15 दिसम्बर 1950) भी थे।

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सरदार वल्लभ भाई पटेल जीवन परिचय

सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 नाडियाद (उनके ननिहाल) में एक किसान परिवार के यहाँ हुआ था उनके पिता का नाम झवेरभाई तथा माता का नाम लाडबा देवी था । वे झवेरभाई तथा लाडबा देवी के चौथे पुत्र थे उनके 3 बड़े भाई थे जिनका नाम सोमाभाई, नरसीभाई और विट्टलभाई भाई थे ।

Sardar Ballabh Bhai Patel Biography

1893 में 16 साल की आयु में उनका विवाह झावेरबा के साथ कर दिया गया था। उन्होंने कभी अपने विवाह को अपनी पढ़ाई के बीच में नहीं आने दिया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्वअध्ययन ही थी । 1897 में प्रारंभिक शिक्षा की आभाव की वजह से वे अपनी 10 वी की परीक्षा 22 साल की उम्र में उत्तीर्ण कर पाये। परिवार की आर्थिक तंगी की वजह से वे कॉलेज में दाखिला नहीं ले पाये , उन्होंने कॉलेज जाने के बजाये खुद ही किताबो के माध्यम से ज़िलाधिकारी की परीक्षा की तैयारी करने लगे तथा उसकी परीक्षा दी ।

जब ज़िलाधिकारी परीक्षा का परिणाम आया तब वे बहुत खुश थे क्यों की उन्होंने सभी परीक्षार्थियों में सब से ज्यादा नंबर लाये थे । पर कुछ समय तक ज़िलाधिकारी की नौकरी करने के बाद वे वकालत की पढ़ाई करना चाहते थे क्यों की वे अंग्रेजो के दावपेच को और बारीकी से जानना चाहते थे ।

इसके लिए वे इंग्लैंड जाना चाहते थे उनके बड़े भाई विट्टलभाई भाई भी वकालत के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे जब वल्लभ भाई का वीसा तथा पासपोर्ट आया तब उनके बड़े भाई उनके वीसा पर इंग्लैंड चले गए क्यों की पासपोर्ट तथा वीसा पर दोनों के नाम एक जैसे थे वी. वी. पटेल। छोटे भाई होने के नाते उन्होंने बड़े भाई की इक्षा का सम्मान किया ।

उसके 3 वर्ष बाद 36 साल की उम्र में सरदार वल्लभ भाई पटेल भी वकालत की पढ़ाई करने इंग्लैंड गए उनके पास कॉलेज जाने का अनुभव नहीं था फिर भी उन्होंने 36 महीने के वकालत के कोर्स को महज़ 30 महीने में ही पूरा कर लिया ये उनकी अप्रतिम बुद्धिमित्ता का ही नतीजा था ।

सरदार वल्लभ भाई पटेल 1913 में वकालत करके भारत लौटे और अहमदाबाद में अपनी वकालत शुरू की। इंग्‍लैंड में वकालत पढ़ने के बाद भी उनका रुख पैसा कमाने की तरफ नहीं था। जल्द ही वह अपने कौशल के बलबुते लोकप्रिय हो गए।

सरदार वल्लभ भाई पटेल बहुत ही कर्तव्यनिष्ठ और अपने कार्य के प्रति बहुत ही ईमानदार तथा समर्पित थे । इस बात अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि, जब वे कोर्ट में केस लड़ रहे थे तो उस समय उन्हें अपनी पत्नी की मृत्यु (11 जनवरी 1909) का तार मिला। पत्र को पढ़कर उन्होंने इस प्रकार अपनी जेब में रख लिया जैसे कुछ हुआ ही नहीं। दो घंटे तक बहस कर उन्होंने वह केस जीत लिया। इसके पश्चात उन्होंने अपनी पत्नी की मृत्यु की सुचना सभी को दी उनकी कर्मनिष्ठा को देख सभी लोग हैरत में पद गए।

अपने मित्रों के कहने पर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 1917 में अहमदाबाद के सैनिटेशन कमिश्नर का चुनाव लड़ा और उसमें भारी बहुमत से जीत गए।यहाँ से उनका रातनीतिक तथा एक स्वतंत्र सेनानी के रूप में जीवन सुरु हुआ । सरदार वल्लभ भाई पटेल गांधी जी के कार्यो तथा उनकी आजादी के लिए लड़ाई करने के तरीके से बहुत ही प्रभावित थे । खास कर सरदार वल्लभ भाई पटेल पर गांधी जी के चंपारण सत्याग्रह की सफलता ने बहुत प्रभाव छोड़ा।

सरदार पटेल का खेडा आंदोलन

सरदार वल्लभ भाई पटेल का खेडा आंदोलन उनके जीवन का पहला और बड़ा आंदोलन था जिसका उन्होंने नेतृत्व किया था । 1918 में गुजरात के खेड़ा खंड में बहुत भैयनकर सूखा पड़ा जिस में की लाखो लोगो को खाने तक की परेशानी आन पड़ी थी। पर किसान पर अंग्रेजो के लगने वाले कर में कोई छूट नहीं थी ।

किसानो ने अंग्रेजो से कर में छूट की मांग की पर अंग्रेजी हुकूमत ने इस मांग को सिरे से ख़ारिज कर दिया । तब गांधी जी ने किसानो का मुद्दा उठाया पर वो अपना पूरा समय खेड़ा में अर्पित नहीं कर सकते थे इसलिए उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो किसानो के लिए लड़ सके तथा उनकी अनुपस्थिति में इस संघर्ष की अगुवाई कर सके तब सरदार वल्लभ भाई पटेल स्वेछा से आगे आये और इस आंदोलन का नेतृत्व किया ।

तब सरदार वल्लभ भाई ने किसानो को कर न देने को कहा और सभी किसानो ने उनकी बात मानते हुए कर देने से इंकार कर दिया तब अन्त में सरकार झुकी और उस वर्ष करों में राहत दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली मजबूत सफलता थी।इसके बाद सरदार पटेल का कद अंग्रेजो तथा गाँधी जी की नजरो में बड़ गया । इसके बड़ सरदार पटेल आजादी की लड़ाई में पूर्णत समर्पित हो गए ।

पटेल का बारडोली सत्याग्रह और सरदार की उपाधि

बारडोली सत्याग्रह भी सरदार पटेल के जीवन का एक महत्पूर्ण आंदोलन था बारडोली सत्याग्रह के कारण ही वल्लभ भाई पटेल, “सरदार वल्लभ भाई पटेल” बन गए। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान वर्ष 1928 में गुजरात में हुआ था जिसका नेतृत्व वल्लभ भाई पटेल ने किया था।

वल्लभ भाई पटेल बारडोली सत्याग्रह

उस समय अंग्रेजी प्रांतीय सरकार ने किसानो पर लगने वाले कर को बड़ा कर 30 प्रतिसत तक कर दिया था इसका गुजरात के किसानो ने बहुत विरोध किया पर अंग्रेजी सरकार ने उनकी एक न सुनी । इसके बाद खुद सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किसानो का समर्थन किया और उनके लिए लड़ते हुए इस सत्याग्रह आंदोलन का प्रतिनिधित्व किया ।

इस आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजी सरकार ने कठोर कदम उठाए और भरचक कोसिस की पर वल्लभ भाई पटेल के आगे अंग्रेजो को झुकना ही पड़ा । न्यायिक अधिकारी बूमफील्ड और एक राजस्व अधिकारी मैक्सवेल ने संपूर्ण मामलों की जांच कर 22 प्रतिशत लगान वृद्धि को गलत ठहराते हुए इसे घटाकर 6.03 प्रतिशत कर दिया। ये वल्लभ भाई पटेल की विदेशी हुकूमत पर एक बड़ी जीत थी ।

इस सत्याग्रह आंदोलन के सफल होने के बाद वहां की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि प्रदान की और गाँधी जी ने ऐसे स्वराज्य की तरफ एक बड़ा कदम बताया था । इसके बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल गाँधी जी के हर के आंदोलन में उनके साथ कदम ताल मिला के खड़े रहे और हर एक जगह उनके लिए अंग्रजो से लड़े।

आजादी के बाद सरदार पटेल का योगदान

आजादी के बाद भी सरदार वल्लभ भाई पटेल का आजाद भारत की बुनियाद रखने में बहुत बड़ा योगदान है आज हम जिस अखंड भारत की बात करते है वो सिर्फ सरदार बल्लभ भाई पटेल की वजह से ही है। जब भारत आजाद हुआ था तब अग्रेजो ने भारत को दो हिस्सों में बात दिया था जिस से की लोगो में साम्प्रदाइक अरजाक्ता फ़ैल गई जिस से की दो पक्षों में खून खराबा और लूट मार होने लगी जिस को रोकने का काम गाँधी जी ने लोहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल को दिया और इसमें पटेल साहब सफल भी हुए।

जब आजाद भारत के प्रथम प्रधान मंत्री की आई तो कांग्रेस की प्रांतीय समिति ये चाहती थी की सरदार बल्लभ भाई पटेल भारत के प्रथम प्रधान मंत्री बने पर महात्मा गाँधी कुछ और ही चाहते थे उन्होंने पंडित जवाहर लाल नेहरू का समर्थन किया था । गाँधी जी की इच्छा का सम्मान करते हुए सरदार पटेल ने अपना नाम वापस ले लिए और उन्होंने उप प्रधान मंत्री बनाना स्वीकार किया।

जब आजाद भारत की प्रथम सदन बानी तो उन्हें उपप्रधान मंत्री के साथ साथ गृह मंत्री का कार्य भार सोपा गया जिसे की सरदार पटेल ने बखूबी निभाया । गृह मंत्री के तोर पर उनका पहला काम ऐसी रियासतों का एकीकरण करना था जो अपने आप को अलग राष्ट्र की तरह प्रेसित कर रही थी । क्यों की भारत में हमेसा से ही छोटे सूबे तथा उनके राजा रहे है आजादी के बाद वे अपने आप को भारत में सविलियन नहीं करना चाहते थे । इन सभी को भारत में मिलाने का काम सरदार वल्लभ भाई पटेल को दिया गया ।

जिस को भी उन्होंने एक बून्द खून बहाये बिना निभाया सिर्फ हैदराबाद को संविलियन करने के लिए उन्हें आपरेशन पोलो के लिए सेना का ओपरेशन चलना पड़ा जिस में भी न एक गोली चली न खून बहा वह के नवाब ने समर्पण कर दिया तथा भारत छोड़ कर वे पाकिस्तान चले गए । आजाद भारत के एकीकरण में एक अभूतपूर्व योगदान के कारण ही उन्हें “भारत का लौह पुरूष” की उपाधि मिली । सिर्फ वो ही थे जो एक कार्य को पूर्ण कार्य सकते थे ।

देशी रियासतों के एकीकरण में सरदार पटेल का योगदान

भारत की स्वतंत्रा के समय भारत के अंतरगत तीन उपनिवेश थे – प्रथम जो सीधे ब्रिटिश शासन तथा भारत के गवर्नर-जनरल के सीधे नियंत्रण में था । दूसरा वे छोटी छोटी रियासते जो वहाँ के राजाओ तथा निजामों के शासन में थी, और तीसरी वो जो फ्रांस और पुर्तगाल के उपनिवेश क्षेत्र थे जैसे चन्दननगर, पाण्डिचेरी, गोवा आदि।

आजादी के समय भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य इन छोटी रियासतों को भारतीय उपनिवेश में सम्मलित करना था जो की एक मुश्किल काम था क्यों की आजादी के पहले ही इन रियासतों के राजाओ ने अपने आप को स्वतंत्र देश घोषित कर दिया था।

जब भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ तब वो बहुत सारी रियासतों में बंटा हुआ था। भारत की आजादी की तारीख 15 अगस्त 1947 लार्ड लुई माउण्टबैटन ने जनमुच कर तय की थी, क्योंकि ये द्वितीय विश्व युद्ध में जापान द्वारा समर्पण करने की दूसरी वर्षगांठ थी। 15 अगस्त 1945 को जापान आत्म समर्पण कर दिया था, तब माउण्टबैटन सेना के साथ बर्मा के जंगलों में थे।

इसी वर्षगांठ को यादगार बनाने के लिए माउण्टबैटन ने 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के लिए तय किया था। पर इस से पहले ही सरदार बल्लभ भाई पटेल ने 562 देशी रियासतों को भारत में मिलाकर भारत को एक सूत्र में बांधा और भारत को मौजूदा स्वरूप दिया। एक कुशल प्रशासक होने के कारण कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें ’लौह पुरुष‘ के रूप में भी याद करता है।

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने आजादी के ठीक पूर्व (संक्रमण काल में) ही पीवी मेनन के साथ मिलकर कई देसी राज्यों को भारत में मिलाने के लिये कार्य आरम्भ कर दिया था। पटेल और मेनन ने देसी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हे की उन्हें अलग राष्ट्र देना सम्भव नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप जूनागढ, हैदराबाद और कश्मीर को छोडक़र 562 रियासतों ने स्वेज्छा से भारतीय परिसंघ में शामिल होने की स्वीकृति दी थी। और इन रियासतों का आजादी के पहले भारत में संविलियन जरुरी था। क्यों की माउण्टबैटन ने जो प्रस्ताव भारत की आजादी को लेकर जवाहरलाल नेहरू के सामने रखा था उसमें ये प्रावधान था कि भारत के 565 रजवाड़े भारत या पाकिस्तान में किसी एक में विलय को चुनेंगे और वे चाहें तो दोनों के साथ न जाकर अपने को स्वतंत्र भी रख सकेंगे।

इन 565 रजवाड़ों जिनमें से अधिकांश प्रिंसली स्टेट (ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य का हिस्सा) थे भारत में संविलाय होने लिए सरदार के समझने पर राजी हो गए और उन्होंने ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए, या यूँ कह सकते हैं कि सरदार वल्लभ भाई पटेल तथा वीपी मेनन ने हस्ताक्षर करवा लिए।
बस हैदराबाद, जूनागढ़, कश्मीर और भोपाल इसमें आना की कर रहे थे । जूनागढ़ पाकिस्तान में मिलने की घोषणा कर चुका था तो काश्मीर स्वतंत्र बने रहने की। जूनागढ़, काश्मीर तथा हैदराबाद तीनों राज्यों को सेना की मदद से विलय करवाया गया किन्तु भोपाल में इसकी आवश्यकता नहीं पड़ी। इनमें से भोपाल का विलय सबसे अंत में भारत में हुआ। भारत संघ में शामिल होने वाली अंतिम रियासत भोपाल इसलिए थी क्योंकि सरदार वल्लभ भाई पटेल और मेनन को पता था कि भोपाल भारत के मध्य में है और ऐसे अंत में भारत में विलय होना ही होगा इसके अलावा उसके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था तो मेमन और सरदार पटेल का ध्यान दूसरी रियासरो पर ज्यादा था । भोपाल जहां नवाब हमीदुल्लाह खान उस रियासत के नवाब थे जो भोपाल, सीहोर और रायसेन तक फैली हुई थी। इस रियासत की स्थापना 1723-24 में औरंगजेब की सेना के बहादुर अफगान योद्धा दोस्त मोहम्मद खान ने सीहोर, आष्टा, खिलचीपुर और गिन्नौर को जीत कर स्थापित की थी। 1728 में दोस्त मोहम्मद खान की मृत्यु के बाद उसके बेटे यार मोहम्मद खान के रूप में भोपाल रियासत को अपना पहला नवाब मिला था।

मार्च 1818 में नजर मोहम्मद खान भोपाल के नवाब। उन्होंने अंग्रेजो की अधीनता के अंतर्गत संधि की और भोपाल रियासत ब्रिटिश साम्राज्य की प्रिंसली स्टेट हो गई । 1926 में भोपाल रियासत के हमीदुल्लाह खान नवाब बने । अलीगढ़ विश्वविद्यालय से शिक्षित नवाब हमीदुल्लाह दो बार 1931 और 1944 में चेम्बर ऑफ प्रिंसेस के चांसलर रहे । जब उन्हें भारत विभाजन की बात पता चली तो उन्होंने चांसलर पद से त्यागपत्र दे दिया था। क्यों की वे रजवाड़ों की स्वतंत्रता के पक्षधर थे और वे भी भोपाल को अलग रियासत बनाना चाहते थे और वे खुद उसके नवाब बने रहना चाहते थे।

14 अगस्त 1947 नवाब हमीदुल्लाह असमंजस में थे क्यों की पाकिस्तान के होने वाले प्रधान मंत्री उन्हें पहले ही पाकिस्तान में सेक्रेटरी जनरल का पद की पेशकश कर चुके थे पर उन्हें अपनी रियासत को मोह नहीं छूट रहा था फिर उन्होंने 13 को फैसला लिया और अपनी बेटी रियासत का शासक बन जाने को कहा ताकि वे पाकिस्तान जाकर सेक्रेटरी जनरल का पद सभाल सकें पर उनकी बेटी आबिदा ने भोपाल की बागडोर संभालने से मन कर दिया।

सभी रियासतों में भोपाल का विलीनीकरण सब से बाद में हुआ इसके पीछे एक और बड़ा कारण ये भी है क्यों की नवाब हमीदुल्लाह जो चेम्बर ऑफ प्रिंसेस के चांसलर थे जिस कारण उनका देश की आंतरिक राजनीति में बहुत दबदबा था साथ ही उनका भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के दखल के साथ नेहरू और जिन्ना दोनों के घनिष्ठ मित्रता थी ।

नवाब हमीदुल्लाह मार्च 1948 को ये फैसला लिया की भोपाल भारत में विलय नहीं होगा तथा भोपाल के स्वतंत्र रहने की घोषणा की। मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का एक मंत्रीमंडल घोषित कर दिया था जिसके प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय थे। इस से भोपाल रियासत में विलीनीकरण को लेकर सब दूर विद्रोह पनपने लगा था। साथ ही विलीनीकरण की सूत्रधार पटेल-मेनन की जोड़ी भी दबाव बनाने लगी थी।

बाद में चतुर नारायण मालवीय भी विलीनीकरण के पक्षधर हो गए तथा प्रजामंडल विलीनीकरण आंदोलन का प्रमुख दल बन गया। अक्टूबर 1948 में नवाब हज पर चले गये और दिसम्बर 1948 में भोपाल के इतिहास का जबरदस्त प्रदर्शन विलीनीकरण को लेकर हुआ, कई प्रदर्शनकारी गिरफ्तार किए गए जिनमें ठाकुर लाल सिंह, डॉ शंकर दयाल शर्मा, भैंरो प्रसाद और उद्धवदास मेहता जैसे नाम भी शामिल थे। पूरा भोपाल बंद था, राज्य की पुलिस आंदोलनकारियों पर पानी फेंक कर उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी।

डॉ॰ शंकर दयाल शर्मा को 23 जनवरी 1949 आठ माह के लिए जेल में दाल दिया गया । इन सब घटनाओ के बिच वी पी मेनन फिर भोपाल गया और नवाब को भोपाल की भौगोलिक स्थिति के बारे में बताते हुए बताया की भोपाल भारत के मध्य में स्थित है और ये मालवा में स्थित है इस कारण भोपाल को अलग राष्ट्र में तब्दील नहीं किया जा सकता भोपाल को मध्यभारत का हिस्सा बनना ही होगा। अंत में 29 जनवरी 1949 को नवाब ने उनके द्वारा बनाये गए मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर दिया और सत्ता के सारे सूत्र एक बार फिर से अपने हाथ में ले लिए। इस बीच पंडित चतुरनारायण मालवीय इक्कीस दिन के उपवास पर बैठ चुके थे।

पी वी मेनन लाल कोठी (वर्तमान राजभवन) भोपाल में रहकर वह की आंतरिक तना कासी पर नजर रखे हुए थे तथा वह रह कर नवाब पर राजनीतिक तथा मानसिक दबाव बनाये हुए थे । अंत में 30 अप्रैल 1949 को नवाब मेनन के सामने विलीनीकरण के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। रदार पटेल ने नवाब को लिखे पत्र में कहा “मेरे लिए ये एक बड़ी निराशाजनक और दुख की बात थी कि आपके अविवादित हुनर तथा क्षमताओं को आपने देश के उपयोग में उस समय नहीं आने दिया जब देश को उसकी जरूरत थी।

आखिर कार 1 जून 1949 को भोपाल को भारत का हिस्सा बन गया तथा नवाब को 11 लाख सालाना प्रिवीपर्स (लोकतांत्रिक राजतंत्र में राज्य के स्वायत्त शासक एवं राजपरिवार को मिलने वाले विशेष धनराशी ) देय किया गया । एनबी बैनर्जी को केंद्र सर्कार द्वारा चीफ कमिश्नर नियुक्त किया गया जो की उन्होंने 1 जून 1949 को ही वह का पद भर संभाला ।लगभग 225 साल पुराने (1724 से 1949) नवाबी शासन का प्रतीक रहा तिरंगा (काला, सफेद, हरा) लाल कोठी से उतारा जा रहा था। तथा तिरंगा 1 जून 1949 को लाल कोठी पर लहराया।

 

 

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