महात्मा गांधी जी का जीवन तथा संघर्ष | About gandhi ji in hindi

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महात्मा गांधी जी का जीवन तथा संघर्ष | About gandhi ji in hindi

About Gandhi Ji In Hindi

इस पोस्ट में हम गाँधी जी के बारे में (about gandhiji in hindi) जानकारी देंगे। उनके द्वारा किये गए सत्याग्रह (चंपारण और खेड़ा सत्याग्रह) | उनके सिद्धांत तथा विवाह और शिक्षा के बारे में, दक्षिण अफ्रीका अंदोलन ,भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तथा असहयोग आन्दोलन, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आन्दोलन उनके माता पता भाई तथा पत्नी के बारे में बात करेंगे

भारत भूमि पर राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी को कौन नहीं जानता सब अपने अनुसार उन्हें बुलाते है कोई महात्मा कोई गाँधी जी तो कोई राष्ट्र पिता । देश ने तो उन्हें कई नामो से सम्मानित किया पर उनके माता पिता का दिया हुआ नाम “मोहनदास करमचंद गांधी” था। आज जो हम खुली हवा में सास ले रहे है इस आजाद हिंदुस्तान में जी रहे है, इसको प्राप्त करने में महात्मा गाँधी जी का बहुत बड़ा योगदान है । उन्होंने अपने सबसे शक्तिसाली हथियार अहिंसा के बलबूते हमे ये आजादी दिलवाई है। उनके जीवन का एक बहुत बड़ा मूल मंत्र था “बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो बुरा मत बोलो” उन्हें हर बुराई में अच्छाई नजर आती थी, इसी की बदौलत बुरे से बुरा इंसान भी महात्मा गांधी जी से प्यार करने लगता था।

About Gandhi Ji In Hindi

गांधी जी की जीवनी – Gandhi ji Biography in hindi

महात्मा गांधी जी ऐसे ही महात्मा नहीं बने इसके पीछे उनके जीवन का कठिन संघर्ष छुपा है। गाँधी जी का जन्म पोरबंदर (गुजरात) में हुआ था । गाँधी जी का जन्म दिनांक (gandhi ji date of birth) – 2 अक्टूबर 1869 था। उनका जन्म पंसारी परिवार के यहाँ हुआ था उनके पिता का नाम करमचन्द गान्धी तथा माता का नाम पुतली बाई था।

उनके पिता अंग्रेजी शासन काल में अग्रेजो के अंतरगत आने वाली एक रियासत पोरबंदर के दीवान थे अर्थात उनका मुख्य कार्य अग्रेजो के लिए रियासत में से कर वसूली तथा उसका हिसाब किताब रखना था। पुतली बाई करमचन्द गान्धी (महात्मा गाँधी के पिता) की तीसरी पत्नी थी उनकी पहली 2 पत्नियों का प्रवाव के दौरान देहवास हो गया था। गांधी जी की माँ (पुतली बाई) बहुत ही धार्मिक प्रवर्ति की थी जिस ने की गाँधी जी के जीवन पर विशेष असर छोड़ा था।

महात्मा गाँधी जी विवाह तथा शिक्षा

मई 1883 महात्मा गाँधी जी का विवाह 13 वर्ष की उम्र में कस्तूरबा माखनजी से हुआ था उस समय कस्तूरबा गाँधी की उम्र 14 वर्ष थी। 1885 में गाँधी के यहाँ पुत्र ने जन्म लिया पर वो ज्यादा दिन तक जीवित नहीं रहे।

गाँधी जी की प्रारंभिक शिक्षा पोरबंदर में ही हुई उन्होंने 1887 में मॅट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण फिर 19 वर्ष की आयु में 4 सितम्बर 1888 को इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लन्दन में कानून की पढाई करने के लिए दाखिला लिया । भारत से जाते समय गांधी जी की माँ ने गांधी जी से प्रतिज्ञा ली की वे कभी सरब वह मांस का सेवन नहीं करेंगे । इस प्रतिज्ञा को गाँधी जी ने अपने पुरे जीवन कल तक पूरा किया।

इंग्लैंड में गाँधी जी ने मॉस तथा शराब का सेवन तो नहीं किया पर उस समय इग्लैंड में गाँधी जी अंग्रेजी सभ्यता से कभी प्रभावित हुए थे जैसे वह का नृत्य पहनावा रहन सहन आदि ।

वहां पर गाँधी जी ने अपने शाकाहार से वह के कुछ लोगो को भी प्रभावित किया तथा वह की शाकाहारी सोसिटी को भी ज्वाइन किया। सोसिटी में वे जिन शाकाहारी लोगों से मिले उनमें से कुछ थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य भी थे।

सोसाइटी के लोगो से गाँधी जी को इंग्लैंड में श्रीमत भगवत गीता पढ़ने की प्रेरणा मिली साथ ही उन्होंने दूसरे धर्मो के भी धर्म ग्रन्थ पढ़े तथा उनसे कभी प्रभावित हुए। इस से पहले गाँधी जी का धर्मो में इतनी रूचि नहीं थी।

1891 में गाँधी जी बरिस्ट्रर (वकील) बन के भारत वापस लोट आये तथा उन्होंने अपनी सुरुवाती वकालत बम्बई शहर में शुरू की पर उन्हें उसमे सफलता नहीं मिल पाई उस समय गाँधी जी की माँ का भी स्वर्गवास हो गया था जिस से की उनपर दोहरी चोट लगी थी।

बाद में उन्होंने हाई स्कूल शिक्षक के रूप में नौकरी के लिए आवेदन किया पर स्कूल ने उनका आवेदन अस्वीकृत कर दिया जिस से उन्हें बहुत ठेस पहुंची इसके बाद उन्होइने राजकोट में गरीब तथा जरुरतमंदो की मुकदमे की अर्जियाँ लिखना शुरू किया।

इस के कुछ समय बाद 1893 में ही गाँधी जी को एक भारतीय फर्म दादा अब्दुल्ला एण्ड अब्दुल्ला के कैश को लड़ने के लिए दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा जो की उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन था।

गाँधी जी का दक्षिण अफ्रीका अंदोलन (1893-1914)

एक भारतीय फार्म दादा अब्दुल्ला एण्ड अब्दुल्ला के कैश के लिए गाँधी जी को 1893 में दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा था पर वहां की एक घटना ने गाँधी जी को महात्मा गाँधी बना दिया ।

गाँधी जी वहां पर रंग भेद का सामना करना पड़ा पर एक बार वो जब ट्रैन में प्रथम श्रेणी का टिकिट ले कर यात्रा कर रहे थे पर उन्हें साथ सह यात्री जो की गोर थे को यहाँ कह कर की तुम काळा हो तृतीय श्रेणी में जाओ और बात न मानाने पर ट्रैन के बहार फेक दिया था।

इस बात से गाँधी जी हृदय बहुत अघातित हुआ तथा बाद में भी होटल में कमरा न दिया जाना तथा वहां के जज द्वारा उनकी पगड़ी उतरवाने जैसी घटनाये हुई।

ये सारी घटनाये गाँधी जी के जीवन को पूरी तरह बदल दिया अग्रेजो का भारतीयों के प्रति इस तरह के व्यवहार का गाँधी जी ने भरचक विरोध किया।

तथा रंग भेद के खिलाफ गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में मौजूद भरियो के साथ मिल कर आंदोलन छेड़ दिया तथा 1894 में नटाल भारतीय कांग्रेस का गठन किया तथा इंडियन ओपिनियन अखबार जिस में भारतीय अपने कलमों के द्वारा इसका विरोध करते थे।

गाँधी जी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

1915 में गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका से वापस आ गए और आकर उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेसन में अपने विचार व्यक्त किये धीरे धीरे गाँधी जी का नाम भारत में बड़ा हो गया उन्होने अहिंसा तथा सत्याग्रह के रास्ता अग्रेजो के लिए भी बड़ी मुसीबत बन गया।

चंपारण और खेड़ा का आंदोलन

गाँधी जी का पहला बड़ा आंदोलन 1918 में चम्पारन और खेड़ा सत्याग्रह था। गुजरात के खेड़ा में अकाल पडने पर भी अग्रेजो के द्वारा बढ़ाया गया कर से वहां की जनता त्राहि त्राहि हो गई तब गाँधी जी न कर देने से मन किया इस आंदोलन में गाँधी जी का साथ सरदार बल्लभ भाई पटेल ने दिया खेड़ा का मोर्चा सत्य तथा अहिंसा से उन्होंने संभाला। गाँधी जी के नेतृत्व में चम्पारन तथा खेड़ा दोनों ही जगह अंग्रेजी हुकूमत को झुकना पड़ा और कर बढ़ोतरी को वपस लेना पड़ा।

असहयोग आन्दोलन

जलीवाला बैग ने नरसहार के बाद देश में बहुत अराजकता फ़ैल गई तब तक गाँधी जी भी राट्रीय भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष बन चुके थे उसके बाद गाँधी जी का बड़ा आन्दोलाब असहयोग आन्दोलन था इसके तहत गाँधी जी ने हर के भारतीय से अग्रजी सामानो का बहिस्कार किया गया। और हर एक स्वदेशी वस्तुए उपयोग करने को कहा । इसका अंग्रेजो को बहुत ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा । पर 1921 में चोरा चोरी कांड के बाद गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन को वापस ले लिया ।

असहयोग आन्दोलन के लिए गाँधी जी पर राजद्रोह का इल्जाम लगा के गिरफ्तार किया गया 10 मार्च, 1922, मुकदमा चलाया गया जिसमें उन्हें छह साल कैद की सजा सुनाकर जैल भेज दिया गया। 18 मार्च, 1922 से लेकर उन्होंने केवल 2 साल ही जैल में बिताए थे कि उन्हें फरवरी 1924 में आंतों के ऑपरेशन के लिए रिहा कर दिया गया।

नमक सत्याग्रह

26 जनवरी 1930 को लाहौर में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने भारतीय स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया। इसे भारत में हर एक राजनैतिक पार्टियों ने मनाया था। अग्रेजो के अत्याचार भारतीयों पर दिन प्रति दिन बढ़ते ही जा रहे थे। अग्रेजो के बढ़ते अत्या चारो का गाँधी जी ने पूरजोद विरोध किया। अग्रेजो ने भारत में भारतीयों द्वारा बनाये जाने वाले नमक पर भी कर वसूलने के फैसला किया इस से गाँधी जी बहुत ही आहत हुए तथा उन्होंने मार्च 1930 में नमक कर के खिलाफ सत्याग्रह चलाया जो 400 किलोमीटर की यात्रा के साथ 12 मार्च को अहमदाबाद से सुरु हुआ तथा 6 अप्रेल को दांडी में जा कर ख़तम हुई तथा दांडी में गाँधी जी ने स्वयं वह नमक बनाया तथा नमक कानून को तोडा इस आंदोलन में लगभग 80000 लोग शामिल हुए तथा गाँधी जी के साथ इन्होने भी यात्रा की।

भारत छोड़ो आन्दोलन

1939 में जब द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ा तो अंग्रेजो ने भाटियो से उनका सहयोग करने का आवाहन किया तथा अग्रेजो ने भारतीय बटालियन को नाजियों से लगने के लिए भेजा। जब तक आजादी के लिए भारत में आक्रोश बहुत बढ़ता जा रहा था । भातीय पार्टी भेजने के विरोध में सभी भारतीय सदस्य जो की अंग्रेजी सदन का हिस्सा थे ने अपना इस्तीफा दे दिया । पहले तो गाँधी जी अग्रेजो के सहयोग में थे पर जब आक्रोश ज्यादा बढ़ गया तो गाँधी जी इसके पूर्ण विरोध में आ गए उन्होंने कहा की अगर अग्रेज हुम्हे आजादी नहीं दे सकते तो हमारे लोग उनके लिए अपना खून क्यों बहाये।

जैसे जैसे युद्ध आगे बड़ा गाँधी ने अग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन अधोलें का आवाहन किया इसमें । कुछ ही समय में भारत छोड़ो आंदोलन सर्वाधिक शक्तिशाली ानोडलं बन गया इसमें भारत के बहुत सरे लोग जुड़े। अग्रेजो ने इस आंदोलन के दबाने के लिए अंग्रेजो ने भरचक प्रयास किया पुलिस की गोलियों से हजारों की संख्‍या में स्वतंत्रता सेनानी या तो मारे गए या घायल हो गए और हजारों लोगो को गिरफ्तार कर लिए गया। गाँधी जी ने अंग्रेजो को ये स्पस्ट बता दिया था की वे उनका साथ तब तक नहीं देंगे तब तक की उन्हें पूर्ण स्वराज नहीं दे देते । उस समय गाँधी जी ने स्वतंत्र सेनानी और कांग्रेसिओ को करो और मारो के नारे के साथ आजादी के लिए अहिंसा तरीके से आजादी के लिए लड़ने को कहा।

गाँधी जी और भारत विभाजन

1946 में गाँधी जी ने कांग्रेस को ब्रिटिश केबीनेट मिशन के प्रस्ताव ठुकराते कहा की वे भारत का विभाजन नहीं चाहते क्यों की अग्रेजो के द्वारा बनाये गए भारत विभाजन प्लान के अनुसार भारत में मुस्लिम बहुल इलाको को अलग देश केरूप में विकसित किया जाना था । पर गाँधी जी इसके विरोध में थे। साथ ही जिन्ना की नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग भी बटवारे के समर्थन में थी ।

नेहरू तथा पटेल जानते थे की मुस्लिम लीग इस प्रताव को नहीं मानेगी। अधिकतर हिंन्दू, सिख तथा मुस्लिम भी अलग अलग देख के पक्ष में थे। मुहम्मद अली जिन्ना, मुस्लिम लीग के नेता ने, पश्चिम पंजाब, सिंध, उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत और पूर्वी बंगाल को एक अलग देश पाकिस्तान बाबाने के पक्षधर थे। हिन्दू मुस्लिम के बढ़ते दंगे तथा देश में बढ़ती अरजक्ता को देख कांग्रेस नेताओं ने बंटवारे की इस योजना के लिए समर्थन दे दिया।

अंत में 14 अगस्त 1947 को भारत तथा पाकिस्तान 2 देश में विभाजन हो गया। दोनों देशो में में बढते हिन्दू मुस्लिम तथा अराजकता को रोकने के लिए गाँधी जी ने पुरे पाकिस्तान में यात्रा की तथा भारत के सीमांत हिस्सों की भी यात्रा की और लोगो को शांति से रहने के लिए समझाया।

गाँधी जी की हत्या

गाँधी जी में कभी किसी का बुरा नहीं किया पर सायद कुछ लोगो को उनकी अच्छाई भी राज नहीं आती 30 जनवरी 1948 को गाँधी जी की हत्या नाथूराम गोडसे द्वारा चलाई गई गोली से नई दिल्ली के बिड़ला भवन में हुई उनके आखरी शब्द थे “है राम” और बस वे राम नाम में विलीन हो गए । नाथूराम गोडसे हिन्दू राष्ट्रवादी थे तथा कट्टरपंथी हिंदु महासभा के सदस्य थे। वे गाँधी जी के द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाले सहायता राशि के विरोधी थे । अग्रेजो द्वारा तय की गई राखी पहले भारत ने रोक ली थी क्यों की पाकिस्तान में पीठ पर छुरा घोपा था पर गाँधी जी ने इसका विरोध किया तथा पाकिस्तान को सहायता राशि दी गई ये बात नाथूराम गोडसे को सही नहीं लगी थी। नाथूराम गोडसे को उसी टाइम पकड़ लिया गे बद में गोड़से और उसके उनके सह षड्यंत्रकारी नारायण आप्टे को कॅश चला कर फांसी की सजा सुनाई गई तथा 15 नवंबर 1959 को इन्हें फांसी दे दी गई।

 

 

 

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